पाठ परिचय
गुरुदयाल सिंह द्वारा रचित यह आत्मकथात्मक पाठ उनके बचपन की खट्टी-मीठी यादों का झरोखा है। यह कहानी उस दौर के बच्चों के मनोविज्ञान, खेल-कूद, स्कूल जाने के डर और विशेष रूप से सख्त शिक्षकों (जैसे पी.टी. मास्टर) के आतंक का सजीव चित्रण करती है। यह बताता है कि वे कठिन दिन ही वास्तव में 'सपनों के से दिन' थे।
1. बचपन के खेल, धूल और चोटें
लेखक बताते हैं कि बचपन में सभी बच्चे एक जैसे होते थे। वे धूल-मिट्टी में खेलते, घुटने और टखने छिलवा लेते और कपड़े फाड़ लेते थे। घर पहुँचने पर माँ-बहनों से मार पड़ती थी, लेकिन वे इतनी जल्दी ठीक हो जाते थे कि अगले दिन फिर उसी जोश से खेलने पहुँच जाते थे। उस समय बच्चों की पढ़ाई में किसी की खास रुचि नहीं होती थी, अधिकतर परिवार अनपढ़ थे।
2. स्कूल जाने का डर और छुट्टियों का मज़्ज़ा
लेखक और उनके साथियों के लिए स्कूल जाना किसी कैदखाने से कम नहीं था। उन्हें सबसे ज़्यादा इंतज़ार गर्मी की छुट्टियों का रहता था। छुट्टियों में नानी के घर जाना, वहाँ खूब खाना-पीना और खेलना उन्हें बहुत पसंद था। जो बच्चे नानी के घर नहीं जा पाते थे, वे गाँव में ही तालाब में नहाकर और रेतीले टीलों पर खेलकर छुट्टियाँ बिताते थे।
3. छुट्टियों का होमवर्क (गृहकार्य)
छुट्टियों का एक बड़ा हिस्सा बीत जाने के बाद होमवर्क का डर सताने लगता था। वे हिसाब लगाते कि अगर रोज़ इतने सवाल करेंगे तो काम पूरा हो जाएगा। लेकिन खेल-कूद में समय बीत जाता था। अंत में, वे सोचते थे कि होमवर्क पूरा न करने पर मास्टरों की पिटाई खा लेना ज़्यादा 'सस्ते का सौदा' है, बजाय इसके कि बची हुई छुट्टियाँ काम करने में बिताई जाएँ।
4. मास्टर प्रीतम चंद और हेडमास्टर शर्मा जी
स्कूल में दो तरह के शिक्षक थे। एक तरफ हेडमास्टर शर्मा जी थे, जो बहुत शांत, विनम्र और बच्चों को प्यार करने वाले थे। दूसरी तरफ पी.टी. मास्टर प्रीतम चंद थे, जो बच्चों के लिए साक्षात 'यमराज' थे। वे छोटी सी गलती पर भी बहुत क्रूर सजा देते थे (जैसे 'खाल खींचना'), जिससे बच्चे थर-थर काँपते थे। बच्चे प्रार्थना सभा में सिर्फ पी.टी. सर के डर से ही सीधी लाइन में खड़े रहते थे।
5. पी.टी. सर की क्रूरता और निलंबन (Suspension)
एक दिन मास्टर प्रीतम चंद ने चौथी कक्षा के बच्चों को फारसी का शब्द रूप याद न करने पर बहुत कठोर सजा दी (मुर्गा बनाकर पीठ पर ईंटें रखना)। जब हेडमास्टर शर्मा जी ने यह देखा, तो वे बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने पी.टी. मास्टर को तुरंत मुअत्तल (Suspend) कर दिया। इसके बाद बच्चों ने राहत की साँस ली।
6. निष्कर्ष: वे सुनहरे दिन
बड़े होने पर लेखक को अहसास होता है कि बचपन के वे दिन, जिनमें स्कूल का डर और खेलने का जुनून था, वही वास्तव में जीवन के सबसे सुनहरे और 'सपनों के से दिन' थे।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ओधड़-धो पड़ना | बुरी तरह पीछे पड़ना / खूब डाँटना-मारना |
| मुअत्तल (Suspended) | निलंबित करना / नौकरी से कुछ समय के लिए हटाना |
| खाल खींचना | बहुत बुरी तरह मारना-पीटना (कठोर दंड) |
| चवन्नी | पच्चीस पैसे का सिक्का (पुराने समय में महत्वपूर्ण राशि) |
| सस्ते का सौदा | आसान काम / कम नुकसान वाला विकल्प |
| कुएँ में बाँस डालना | भय के कारण अत्यंत सन्नाटा छा जाना |
| फराटे भरना | बहुत तेज़ दौड़ना |
| ठिठियाकर हँसना | ज़ोर-ज़ोर से खिल्लियाँ उड़ाकर हँसना |
| ननिहाल | नानी का घर |